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रिपोर्ट: अमित पवार
प्रधान संपादक, खबर ताज़ा न्यूज

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की जब भी बात होगी, भर्तृहरि गायिका स्वर्गीय सूरज बाई खांडे का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिया जाएगा। 12 जून 1949 को जन्मी सूरज बाई ने मात्र 8 वर्ष की अल्पायु से ही लोक कला की साधना शुरू कर दी थी। उनकी आवाज में वो जादू था जिसने न केवल देश, बल्कि सात समंदर पार 17 देशों में छत्तीसगढ़ी माटी की खुशबू बिखेरी।
10 मार्च 2018 को भले ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी विरासत आज भी उनके परिवार के जरिए जीवित है। उनके पति लखन लाल खांडे (75), जो स्वयं 1970 से पंथी, चंदैनी और भोजली जैसे विधाओं के सिद्धहस्त कलाकार रहे हैं, आज भी अपनी पत्नी के अधूरे सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

विरासत को सहेजती छोटी बहन सोहरा खांडे
सूरज बाई के निधन के बाद उनकी छोटी बहन सोहरा खांडे (57) ने इस मशाल को थाम लिया है। सोहरा बताती हैं कि उन्होंने बड़ी बहन के जाने के तुरंत बाद गाना शुरू किया ताकि ‘भर्तृहरि’ जैसी अनमोल लोक विधा लुप्त न हो जाए। सोहरा न केवल भर्तृहरि, बल्कि चंदैनी, कर्मा, ददरिया और ढोला-मारू को भी पूरी शिद्दत से गा रही हैं। उन्होंने राजिम और रायपुर जैसे बड़े मंचों पर अपनी प्रस्तुति दी है, लेकिन उन्हें आज भी उस ‘बड़े प्लेटफॉर्म’ की तलाश है जो उनकी बड़ी बहन की विरासत को आगे बढ़ा सके।

बेटे सौरभ खांडे और परिवार की मांग
सूरज बाई के छोटे बेटे सौरभ खांडे ने बताया कि उनके पिता पिछले 10-12 वर्षों से माँ को ‘पद्मश्री’ दिलाने का प्रयास कर रहे थे। एक अनपढ़ महिला होने के बावजूद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो ख्याति अर्जित की, वह गौरव की बात है। परिवार की इच्छा है कि माँ को मरणोपरांत यह सम्मान मिले। साथ ही, परिवार चाहता है कि सूरज बाई के नाम पर एक कला विद्यालय खोला जाए, जहाँ आने वाली पीढ़ी को छत्तीसगढ़ी लोक गायन का प्रशिक्षण दिया जा सके।
अमित जोगी ने परिवार से की मुलाकात, दिए बड़े आश्वासन
आज स्वर्गीय सूरज बाई खांडे के निवास स्थान पर जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के वरिष्ठ नेता श्री अमित जोगी ने उनके परिवारजनों से विशेष मुलाकात की। इस दौरान परिवार के सदस्यों ने उन्हें बताया कि सूरज बाई खांडे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ और बिलासपुर का नाम रोशन किया है, इसलिए उनके स्वर्गवास के बाद भी उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया जाना चाहिए।
श्री अमित जोगी ने परिवार की बातों को गंभीरता से सुनते हुए कहा, “सूरज बाई खांडे बिलासपुर की गौरव हैं। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री मिलना ही चाहिए और इसके लिए हम सरकार से पुरजोर मांग करेंगे।”
उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि उनकी स्मृति में एक स्मारक बनाया जाना चाहिए तथा शहर के किसी प्रमुख चौक का नाम भी उनके नाम पर रखा जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान को याद रख सकें।

उपेक्षा का दर्द और उम्मीद की किरण
लोक कला की इस महान साधिका का परिवार आज भी सरकार से सहयोग की उम्मीद लगाए बैठा है। सोहरा खांडे कहती हैं, “दीदी का गाना रुकना नहीं चाहिए। यह कला कल भी जिंदा थी, आज भी है और कल भी रहेगी, बस सरकार हमें एक उचित मंच और प्रोत्साहन प्रदान करे।”
छत्तीसगढ़ की इस ‘कोकिला’ की विरासत को सहेजना केवल एक परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश का कर्तव्य है।


अमित पवार
प्रधान संपादक
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