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प्रस्तुति:
अमित पवार
प्रधान संपादक, खबर ताज़ा
(ख़बर भी, खौफ़ भी, सच्चाई भी)

बिलासपुर | माह-ए-रमजान महज भूख-प्यास और तस्बीह तक महदूद नहीं है, बल्कि यह रूह की पाकीजगी, बेमिसाल सब्र और इंसानियत की निस्वार्थ सेवा का पैगाम है। बिलासपुर की गंगा-जमुनी तहज़ीब के साये में शहर की मस्जिदों से उठती दुआएं और अकीदतमंदों की कतारें इस बात की तस्दीक करती हैं कि यह मुकद्दस महीना हमें एक बेहतर इंसान बनाने की राह दिखाता है।
किरदार और अख़्लाक में झलके असली ईमान
मसानगंज स्थित सुन्नी रज़ा मस्जिद के खतीब व इमाम मोहम्मद मुकर्रम रज़ा ने बहुत ही संजीदा मशवरा दिया है। उन्होंने कहा कि— “ईमान केवल मस्जिद की चारदीवारी तक महदूद नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी झलक हमारे लेन-देन, हमारे अख़्लाक और सामाजिक ज़िम्मेदारियों में साफ नज़र आनी चाहिए।”
हकीकत में, रोज़ा इंसान को शिद्दत की भूख और प्यास का अहसास इसलिए कराता है ताकि वह समाज के उस बेसहारा तबके के दर्द को महसूस कर सके जो मुफ़लिसी में दिन गुज़ारता है। यही वह हमदर्दी है, जो इंसानियत की मज़बूत बुनियाद तैयार करती है।
वक्त की ज़रूरत और खास इंतज़ामात
आज के मसरूफ़ दौर और बदलती जीवनशैली को ज़हन में रखते हुए मगरपारा रोड स्थित मक्का मस्जिद की इंतजामिया कमेटी ने एक काबिले-तारीफ पहल की है। यहाँ रात 10 बजे से तरावीह का आगाज़ किया गया है, ताकि नौकरीपेशा और कारोबारी तबका अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारियों के बाद पूरी तसल्ली से इबादत में शरीक हो सके। इसके साथ ही शहर के दीगर इलाकों में 11 और 15 दिनों की मुख़्तसर व विशेष तरावीह का भी एहतमाम किया जा रहा है।

दयानतदारी और रूहानियत का संगम
सहरी की बरकत से लेकर इफ्तार की मसर्रत तक, एक रोज़ेदार का पूरा वक़्त खुदा की राह में वक़्फ़ रहता है। पांचों वक्त की नमाज़ और देर रात तक गूंजती तरावीह की तिलावत ने शहर की फिजाओं को रूहानी रंग में रंग दिया है। रमजान हमें सिखाता है कि ईमानदारी (दयानतदारी), कड़ी मेहनत और आपसी भाईचारे को अपनी ज़िंदगी का मुस्तकिल (स्थायी) हिस्सा बनाएं।
मेरी नज़र में, रमजान का यह महीना हमें खुद के भीतर झांकने का मौका देता है। आइए, इस पाक महीने को महज़ एक मज़हबी रवायत न मानकर, इंसानियत के जश्न के तौर पर मनाएं।

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