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बिलासपुर शिक्षा विभाग में पदोन्नति का बड़ा खेल: हाईकोर्ट और DPI के आदेश ताक पर, बैकडोर से रेवड़ी की तरह बांटी गईं पोस्टिंग

रिपोर्ट:
अमित पवार
प्रधान संपादक

बिलासपुर। न्यायधानी के शिक्षा विभाग में पदोन्नति और संशोधन के नाम पर एक बड़े फर्जीवाड़े का मामला गर्माता जा रहा है। आरोप है कि जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) विजय टांडे और लिपिक सुनील यादव ने मिलीभगत कर हाईकोर्ट और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के स्पष्ट आदेशों को दरकिनार करते हुए शिक्षकों को नियम विरुद्ध तरीके से मनचाही जगहों पर पदस्थापित कर दिया है। इस पूरे मामले के दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने कलेक्टर और कमिश्नर से लिखित शिकायत कर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

नियमों को कुचलकर दी गई ‘प्राइम’ पोस्टिंग


​शिकायत के अनुसार, सहायक शिक्षकों को प्रधान पाठक के पद पर पदोन्नति देने की प्रक्रिया 27 दिसंबर 2024 को तत्कालीन DEO टी.आर. साहू द्वारा शुरू की गई थी। इसके खिलाफ कुछ शिक्षक कोर्ट गए, जहां हाईकोर्ट ने उन्हें DPI के पास अपनी बात रखने का निर्देश दिया। 4 सितंबर 2025 को DPI ने इन अभ्यावेदनों को सिरे से खारिज कर दिया और पूर्व के निर्देशों के तहत ही पदस्थापना करने का आदेश दिया। लेकिन असली खेल यहीं से शुरू हुआ। आरोप है कि मौजूदा DEO विजय टांडे ने आदेशों की व्याख्या अपने हिसाब से करते हुए शिक्षकों को उनके दूरस्थ मूल स्थानों के बजाय शहरी और सुविधाजनक क्षेत्रों में पोस्टिंग दे दी।

पदों का ‘बंदरबाँट’ – कुछ प्रमुख उदाहरण:
​हलधर साहू: खोगसरा (पेंड्रारोड) के बजाय राजेंद्र नगर बिलासपुर में पदस्थापना।
​शिप्रा बघेल: मस्तूरी के स्थान पर पौसरा (बिल्हा) में पोस्टिंग।
​सूरज कुमार सोनी: तखतपुर के बजाय बिल्हा ब्लॉक में पदस्थापना।

​3 साल पुरानी वेटिंग लिस्ट से बने ‘प्रधान पाठक’


मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा वेटिंग लिस्ट को लेकर हुआ है। नियमानुसार पदोन्नति सूची जारी होने के 10 दिनों के भीतर ज्वाइन न करने पर पात्रता स्वतः निरस्त हो जाती है। बावजूद इसके, करीब तीन साल बाद नई DPC कमेटी गठित कर वेटिंग लिस्ट से टकेश्वर जगत, आस्था गौरहा, फुलेश सिंह, हेमलता पटेल और ईश्वरी ध्रुव जैसे शिक्षकों को न केवल प्रधान पाठक बना दिया गया, बल्कि उन्हें शहर के स्कूलों में पदस्थापित भी कर दिया गया।

अवमानना का डर या भ्रष्टाचार का ढाल ?


​विभाग की ओर से कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) का हवाला देकर इन आदेशों को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है। जबकि हकीकत यह है कि जब DPI ने अभ्यावेदन निरस्त कर दिए थे, तो कोर्ट के आदेश का पालन वहीं समाप्त हो गया था। ऐसे में मनचाही पोस्टिंग के लिए कोर्ट के नाम का सहारा लेना प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता की ओर इशारा करता है।
कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने इस पूरे प्रकरण को शिक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर हुए ‘लेन-देन’ और भ्रष्टाचार का नतीजा बताया है। अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है कि क्या इन रसूखदार अधिकारियों और नियम विरुद्ध लाभ लेने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई होती है या फाइलें दबा दी जाएंगी।

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