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बिलासपुर: ‘राजकिशोर नगर’ के विकास को निगल गई परिसीमन की लकीरें, सालों से बदहाली की मार झेल रहे 250 से अधिक परिवार

प्रशासनिक फाइलों में ‘सुनियोजित’, जमीनी हकीकत में ‘बदहाल’: माखनलाल चतुर्वेदी नगर और केसर आवास कॉलोनी के बाशिंदे बुनियादी सुविधाओं को तरसे।

रिपोर्ट: अमित पवार
प्रधान संपादक
खबर ताज़ा न्यूज़, बिलासपुर (छ.ग.)

बिलासपुर | नगर निगम के वार्ड क्रमांक 52 (जोन 07) में आने वाला राजकिशोर नगर का एक बड़ा हिस्सा आज सिस्टम की विफलता का जीवित प्रमाण बन चुका है। बिलासपुर विकास प्राधिकरण (B.D.A.) द्वारा करीब ढाई दशक पहले विकसित की गई ‘मक्खनलाल चतुर्वेदी नगर’ और ‘केसर आवास कॉलोनी’ आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। विडंबना यह है कि शहर के इस रिहायशी इलाके में रहने वाले लोग नियमित रूप से निगम को टैक्स दे रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें मिल रही हैं जर्जर सड़कें और सीवरेज मिला हुआ दूषित पानी

  1. जनस्वास्थ्य से खिलवाड़: नलों से आ रहा दूषित पानी
    ​सबसे भयावह स्थिति पेयजल आपूर्ति की है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, पेयजल की पाइपलाइनें पुरानी और क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, जो अब सीवरेज लाइन के संपर्क में आ गई हैं।
    ​दूषित जल: कई घरों में नलों से बदबूदार और गंदा पानी आ रहा है।
    फेल सीवरेज: सीवरेज सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त है, जिससे गंदा पानी वापस घरों में ओवरफ्लो हो रहा है।
    यह स्थिति सीधे तौर पर किसी बड़ी महामारी को निमंत्रण दे रही है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और निगम प्रशासन मौन है।
  1. ‘परिसीमन’ का चक्रव्यूह: न पार्षद सुन रहे, न निगम
    ​स्थानीय जनता के आक्रोश का सबसे बड़ा कारण नगर निगम का ‘परिसीमन‘ है। वार्ड 52 की सीमा रेखा इस तरह उलझी हुई है कि यहाँ का पार्षद क्षेत्र की जिम्मेदारी लेने से बचता है। निवासियों का आरोप है कि उन्हें एक ‘नो मैन्स लैंड’ की तरह छोड़ दिया गया है, जहाँ वोट के समय तो नेता आते हैं, लेकिन विकास के समय सीमा विवाद का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं।

जनता की हुंकार: “अब टैक्स देंगे न चुप्पी साधेंगे”
​कॉलोनी के निवासियों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन ने जल्द ही निम्नलिखित सुधार नहीं किए, तो वे उग्र आंदोलन और ‘टैक्स बंदी’ जैसा कदम उठाने को विवश होंगे:
सड़कों का प्राथमिकता के आधार पर पुनर्निर्माण।
​पेयजल और सीवरेज लाइन का तत्काल पृथक्करण।
​सीमांकन विवाद को सुलझाकर जवाबदेही तय करना।

संपादकीय टिप्पणी:
BDA द्वारा ‘पॉश’ कॉलोनी के नाम पर बेचे गए ये भूखंड आज प्रशासनिक उदासीनता के स्मारक बन गए हैं। क्या स्मार्ट सिटी का सपना देख रहे बिलासपुर के अधिकारियों को इन 250 परिवारों की तकलीफें दिखाई नहीं देतीं?

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