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सड़कों पर दौड़ता ‘मौत का तांडव’: बेकाबू नाबालिग ड्राइवर ले रहे लोगों की जान, क्या अभिभावक नहीं हैं जिम्मेदार ?

रिपोर्ट :- अमित पवार प्रधान संपादक खबर ताजा न्यूज

बिलासपुर: शहर की सड़कों पर इन दिनों एक खतरनाक चलन तेजी से पैर पसार रहा है। रईसजादे नाबालिगों द्वारा बेपरवाह होकर तेज रफ्तार गाड़ियाँ चलाने की घटनाएं अब जानलेवा साबित होने लगी हैं। हाल ही में हुए एक भीषण हादसे ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इन नाबालिगों को स्टेरिंग थमाने का साहस कौन दे रहा है?

हादसे नहीं, ये हैं प्रशासनिक लापरवाही

शहर के मुख्य मार्गों पर नाबालिगों द्वारा महंगी और तेज रफ्तार गाड़ियों का बेखौफ दौड़ना अब आम बात हो गई है। ट्रैफिक नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे इन स्टंट्स और ड्राइविंग का खामियाजा उन बेगुनाह लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो सड़क पर अपनी सामान्य गति से चल रहे होते हैं। ताजा घटना ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया है, जिससे क्षेत्र में भारी आक्रोश है।

अभिभावकों की चुप्पी और कानून का अभाव?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नाबालिग बच्चों को गाड़ियाँ मुहैया कौन करा रहा है? नियम स्पष्ट हैं कि 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों का वाहन चलाना कानूनी अपराध है। इसके बावजूद, रईसजादे अभिभावक अपने बच्चों की ‘जिद’ या ‘स्टेटस सिंबल’ के नाम पर उन्हें मौत के मुंह में धकेल रहे हैं।

कानूनी जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल नाबालिग पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। मोटर व्हीकल एक्ट के तहत वाहन मालिक और अभिभावकों की भी सीधी जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन, जमीनी हकीकत यह है कि अक्सर रसूख के दबाव में ऐसी घटनाओं को रफा-दफा कर दिया जाता है, जिससे इन नाबालिगों के हौसले और भी बुलंद हो जाते हैं।

प्रशासन को जागने की जरूरत’ख़बर ताज़ा न्यूज़’ प्रशासन से मांग करता है कि शहर में नाबालिग ड्राइवरों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाए। केवल चालान काटना ही समाधान नहीं है; गाड़ी मालिकों और माता-पिता पर सख्त आपराधिक मुकदमे दर्ज होने चाहिए ताकि दोबारा ऐसी कोई घटना न हो। क्या हम किसी और की जान जाने का इंतजार करेंगे, या प्रशासन सड़कों पर दौड़ रही इस ‘मौत’ को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा?

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