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​’पशु आश्रय’ या ‘मौत का कचरा घर’? मोपका में बेजुबानों की जिंदगी से हो रहा खिलवाड़

रिपोर्ट :- अमित पवार प्रधान संपादक खबर ताजा न्यूज

बिलासपुर, मोपका: नगर निगम बिलासपुर के दावों की पोल खोलती एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसे देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाए। मोपका वार्ड-48 में स्थित ‘पशु आश्रय स्थल’ का नाम तो सिर्फ कागजों पर है, लेकिन हकीकत में यह स्थान अब एक विशाल ‘कचरा डंपिंग यार्ड’ बनकर रह गया है।

कचरे के ढेर में निवाला ढूंढने को मजबूर बेजुबान

आश्रय स्थल की चारदीवारी के भीतर और बाहर चारों तरफ कचरे का अंबार लगा हुआ है। सबसे भयावह स्थिति यह है कि जिन गायों को यहाँ सुरक्षित रहने के लिए रखा गया है, वे उसी जहरीले कचरे के ढेर में अपना पेट भरने के लिए मजबूर हैं। प्लास्टिक और सड़े-गले कचरे का सेवन कर रहे इन बेजुबानों की तबीयत कब बिगड़ जाए या कब ये काल के गाल में समा जाएं, इसका कोई ठिकाना नहीं है।

प्रशासन की आंखें कब खुलेंगी?

यहाँ फैली दुर्गंध का आलम यह है कि राहगीरों का वहां से गुजरना तो दूर, रुकना भी दूभर हो गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को यह बदहाली कभी दिखाई नहीं दी? महीनों से यह कचरा यहाँ जमा है, लेकिन नगर निगम प्रशासन कुंभकर्णी नींद सो रहा है। जब पशु आश्रय का मतलब ही बेजुबानों को सुरक्षित वातावरण देना है, तो फिर उन्हें कूड़े के ढेर के बीच क्यों झोंका गया है?

बेजुबानों का दर्द कौन सुनेगा?

ये बेजुबान जानवर अपना दर्द किसी से बयां नहीं कर सकते, लेकिन इनकी खामोश तड़प और गंदगी से सनी इनकी हालत जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदनहीनता पर करारा तमाचा है। क्या यह व्यवस्था इतनी लाचार है कि अपने आश्रय स्थलों को स्वच्छ नहीं रख सकती? यदि जल्द ही यहाँ से कचरा नहीं हटाया गया और सफाई व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक विफलता का सबसे शर्मनाक उदाहरण माना जाएगा।

नगर निगम प्रशासन को चाहिए कि वह इस मामले में तत्काल संज्ञान ले और इन बेजुबानों के लिए सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराए।

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