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रिपोर्ट : – अमित पवार प्रधान संपादक खबर ताजा न्यूज
बारहवीं के बाद संस्कृत विद्यार्थियों के सामने उच्च शिक्षा के सीमित विकल्प, प्रदेश में ही अवसर विकसित करने पर जोर

बिलासपुर। संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन की चर्चा अब केवल भाषा को बचाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संस्कृत शिक्षा को आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, शोध और रोजगार से जोड़ने की दिशा में ठोस पहल की जरूरत है। बारहवीं के बाद संस्कृत विद्यार्थियों के सामने उच्च शिक्षा के सीमित विकल्प हैं, जिसके कारण कई विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। आर्थिक और अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते कई विद्यार्थियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है।

यह बात स्वामी परमात्मानंद और पुष्पा दीक्षित ने बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा के दौरान कही।
स्वामी परमात्मानंद ने कहा कि संस्कृत बोर्ड में ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है, जो संस्कृत भाषा और इसकी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर ढंग से समझते हों। प्रदेश में संस्कृत की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कई संस्कृत विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इन संस्थानों को पर्याप्त सरकारी सहयोग और अनुदान मिलना चाहिए। विद्यालयों के संचालन के साथ शिक्षकों और विद्यार्थियों की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल अनिवार्य विषय बनाने से इसके प्रति विद्यार्थियों में रुचि पैदा नहीं होगी। ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें विद्यार्थी अपनी इच्छा से संस्कृत को अध्ययन का हिस्सा बनाएं। इससे भाषा के प्रति स्वाभाविक रुचि बढ़ेगी और संस्कृत की समाज में स्वीकार्यता भी मजबूत होगी।
स्वामी परमात्मानंद ने कहा कि सामान्य सरकारी स्कूलों और पारंपरिक संस्कृत विद्यालयों की समस्याएं अलग-अलग हैं। इसलिए दोनों के लिए एक जैसी नीति लागू करने के बजाय उनकी जरूरतों और परिस्थितियों के अनुरूप अलग दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

बारहवीं के बाद आगे की राह सीमित
संस्कृत विद्यालयों के विद्यार्थियों की प्रमुख समस्या उच्च शिक्षा से जुड़ी है। स्वामी परमात्मानंद ने कहा कि उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद प्रदेश में संस्कृत विद्यार्थियों के लिए आगे की पढ़ाई के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हैं। इसके कारण विद्यार्थियों को दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। आर्थिक स्थिति और अन्य व्यावहारिक परेशानियों के चलते कई विद्यार्थी उच्च शिक्षा जारी नहीं रख पाते। ऐसे में प्रदेश में ही संस्कृत विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के संस्थान और रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए।

संस्कृत के साथ विज्ञान और गणित की पढ़ाई पर जोर
उन्होंने छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामंडल की पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृत विद्यार्थियों को विज्ञान और गणित से जोड़ने की दिशा में प्रयास किए गए हैं। इससे विद्यार्थियों के लिए आगे अध्ययन और रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि, इस दिशा में अभी और व्यापक स्तर पर काम किए जाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल धार्मिक कर्मकांड की भाषा मानना इसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना है। संस्कृत एक समृद्ध भाषा है और इसे आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीक तथा रोजगार के नए क्षेत्रों से जोड़ने की जरूरत है। शिक्षा में शास्त्र, कला और कौशल का संतुलित समावेश होना चाहिए, ताकि विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद आजीविका के अवसर भी तलाश सकें।
स्वामी परमात्मानंद ने कहा कि संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास केवल सरकारी अनुदान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मीडिया, विद्वानों और समाज की सक्रिय भागीदारी से संस्कृत शिक्षा, विद्यालयों की समस्याओं और विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर व्यापक चर्चा जरूरी है। संस्कृत के संरक्षण के साथ उसके विद्यार्थियों के भविष्य को सुरक्षित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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